प्रभात रंजन द्वारा दिलीप कुमार की अनुवादित आत्मकथा 'वजूद और परछाई : दिलीप कुमार' पर यतीश कुमार की समीक्षा
कहानी में सिमटा ज़िंदगी का सफर मुझे बचपन से ही फ़िल्में देखने का बहुत शौक़ रहा है और अच्छे संवाद ख़ुद ही बुदबुदाता रहता था। दिलीप कुमार की संवाद अदायगी देख कर मैं हमेशा मंत्र मुग्ध हो जाता और उनके उच्चारण से जैसे ईर्ष्या होती थी। काफ़ी दिनों से उनकी तबीयत नासाज़ रही और 98 साल की उम्र में 7 जुलाई 2021 को यह महान कलाकार हम सब से ऐसे जुदा हो गया जैसे मंदिर में जलता दिया अचानक गुम हो गया हो । हिन्दी फिल्मों में कई बेहतरीन किरदार निभा कर दिलीप कुमार ने वह मुक़ाम हासिल किया जो अच्छे-अच्छे अभिनेता अपने पूरे करियर में हासिल नहीं कर पाते। अब तक मुझे यह ज्ञात नहीं था कि उनकी आत्मकथा उनकी ज़ुबानी भी है जिसे मैंने नहीं पढ़ी और फिर उसे अविलम्ब मँगवायी जो जल्द ही ' वजूद और परछाई ' के रूप में मेरे हाथ आ गयी। इसे पढ़ते हुए शुरुआत से ही यही लगा जैसे यह आत्मकथा जिस दिलीप कुमार से हमें मिला रही है उन्हें हम कभी जानते ही नहीं थे। एक समय में एक ही फ़िल्म करने वाले ` मैं’ का जम कर प्रयोग से जिसे नफ़रत हो , शुरुआत से ही अभिनय के साथ प्रबंधन को भी समान महत्व देने वाले इंसान , अपनी तारीफ़ और आत्मक...