प्रत्यक्षा के उपन्यास ‘पारा-पारा’ पर यतीश कुमार की काव्यात्मक समीक्षा
1. समय की टहनी पर टंगा चाँद निहारता है मुझे और अपनी ही छाया की गिरफ़्त में छटपटाती हूँ मैं सीली-सी रात मेरी सहेली और कौतुक मेरा राहगीर दोनों के बीच दिल के गड्ढे से चाँद को अपलक देखती मैं छाया की छतरी में अपने ही साए को देखती मुस्कुराते हुए कहती अधूरा या जूठा नहीं पूरा का पूरा चाहिए मेरा चाँद ख़ुशी की खनक में बोरसी भर जाड़ा तलाशती धूप को कमरे के कोने में समेटती अचक्के ख़्यालों से टकराती और फिर संगीत की धार बन जाती 2. द्वैत और अद्वैत के बीच प्रेम चाक-चाक करता बार-बार फिर वही चाक करती नज़र बन जाती दवा भी और दुआ भी उस पर यह जादू कि दर्द दे रहा है मरहम विडंबना यह कि किसे रखूँ सीने में और किसे छोड़ दूँ समय की कील पर सपनों से भरे किसकोल टंगे हैं अब सपनों का लोबान चख रही हूँ लगा कहीं कुछ जल रहा है शायद मुश्किलों को बौना बनाने का हुनर इस ज़िंदगी की तलाश है और किसकोल लिए फिर रही हूँ मैं भीतर पीरान्हा मछली-सा कतर-ब्योंत जारी हैं बुहारना आता नहीं और इच्छाएँ चिंदी-चिंदी बिछी पड़ी हैं 3. रूमानी उदासी मीठा शग़ल है मानो नशे जैसा कोई साथी साथ हो जो होने और न होने के...